सर्प को नियंत्रित करने के लिए एक मंत्र है ( महाभारत में) -
आस्तिकस्य वच: स्रुत्वा य: सर्पो न निवर्तते, शतधा भिद्यते मूर्धनि शिंशवृक्ष फलं यथा
जिसका अर्थ है
जो सर्प आस्तिक के वचन की शपथ सुन कर नहीं लौटता ( और काटने को उद्यत होता है) उसकी मूर्धा (अर्थात् hood) चीड़़ के फल (actually cone with hood like sporophylls) के समान सौ टुकड़े हो जाय.
निश्चय ही आप बहुत सारे विषयों के विद्वान हैं अब पर यह भी प्रतीत हो रहा है कि पार्ट टाइम ओझैती भी करते हैं 😜
इस मंत्र को सिद्ध करने की विधि पूछ कर ओझइती विद्या में प्रयोग में ला सकते हैं.
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